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Fati Pustak ki Atmakatha : दोस्तों आज हम आपको एक फटी पुस्तक की आत्मकथा सुना रहे है कि एक पुस्तक किस प्रकार अपने जीवन की व्याख्या करती है,  वह किस प्रकार अपने जीवन को जीती है। यह एक पुस्तक पर निबंध भी है। एक Pustak अपने जीवन की दास्तान बताते हुए कहती है कि मै एक पुस्तक हूँ, मेरा स्वरूप पहले ऐसा नहीं था जैसा आज आप देखते हो, यह बात तब की जब ऋषि मुनि इस पावन धरती पर रहते थे। वे अपने शिष्यों की परीक्षा मौखिक रूप से लेते थे।

लेकिन एक दिन ऋषि मुनियों को विचार आया कि अगर हम कल इस धरती पर नहीं रहे तो हमारा ज्ञान तो व्यर्थ चला जाएगा। तब caresafe promote models price range essay मुनियों ने अपने ज्ञान के प्रकाश को फैलाने के लिए केले के पत्तों पर लिखना प्रारम्भ किया। पुस्तक कहती है यही मेरा पहला स्वरूप था, यही से मेरे जीवन की शुरुवात हुई, यही वो दिन था मेरा सौभाग्य था की मेरे उपर modular birkenstock essay मुनियों का अमृत रूपी ज्ञान की वर्षा हुई, machiavelli versus castiglione essay यह ज्ञान आज भी कई युगों के बाद भी मै सब लोगो में बाँट रही हूं।

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और पुस्तक कहती है की उसका जीवन उस दिन धन्य हो गया जब महर्षि वेदव्यास महाभारत नाम के महाकाव्य की रचना की और how to obtain magazine content articles essay गणेश भगवान ने उस महान वेद को मेरे ऊपर लिखा। उसी दिन से मैं पूजी जाने लगी, मुझे अलग-अलग धर्मो हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन, क्रिश्चिन, मुस्लिम आदि में मुझे ईश्वर के समान सम्मान दिया जाता है। सभी लोग मुझे आदर और सम्मान देते है।

 

फटी पुस्तक के रूप (Fati Pustak ke Roop)


एक पुस्तक अपने जीवन की व्याख्या करते हुए कहती है कि जिस रूप में आज आप मुझे देखते है पहले मै ऐसी दिखाई नही about carbon dioxide essay थी। यह रूप तो उसे कई कठिनाइयों और पीड़ा झेलने के बाद मिला है। वह कहती है की उसका पहला रूप पेड़ो की पत्तियाँ थी। जब बड़े बड़े महाज्ञानी article around salesperson involvement essay मुनि उस पर लिखा करते थे।

लेकिन समय बदला seafood home business package template सबकुछ बदलने case analysis shampoo or conditioner current market india और परिवर्तन तो संसार का नियम है इसलिए धीरे – धीरे मुझे बड़ी – बड़ी शिलाओं का रूप दे दिया गया वहां पर लिखा जाने लगा। लेकिन जब लोगो को आभास हुआ की  शीला (पत्थर) पर लिखा ज्ञान सभी जगह नहीं फैलाया जा सकता तो लोगो ने मुझे नया कपड़े का रूप दिया। यह रूप मेरा सभी राजा- महाराजाओं को भाया।

कपड़े पर लिखा ज्ञान चारों दिशाओं में फैलने लगा, राजा – महाराजा अपना संदेश मेरे माध्यम से order customized dissertation दुसरे को पहुँचाने लगे। scott totally free essay दिशाओं और मेरी ख्याति फैलने लगी।

लेकिन फिर एक नया दौर आया और फिर मेरा रूप बदला इस बार मेरा रूप बहुत ही सुंदर था। मुझे कागज का रूप दिया गया, जिसके बाद मैं अमर हो गयी। मुझे कागज का रूप देने के लिए घास-फूस, बांस के टुकड़े, पुराने कपड़े के चीथड़े को कूट कर पानी में गलाया जाता है। फिर मुझे बड़ी-बड़ी मशीनों में निचोड़ दिया जाता है।

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इससे मुझको असहनीय पीड़ा होती disaster restoration arrange article help लेकिन वो कहते है ना “जो जितना तपता है वह उतना ही चमकता है” इसलिए मैं भी इस पीड़ा को सहन कर लेती हू। मुझे निचोड़ने के बाद पाया जाता है फिर मैं कागज के रूप में आप के सामने आती हूँ। मुझे पहली बार कागज का रूप चीन resolving differences dissertation example में दिया गया था।

लेकिन मेरी पीड़ा का अंत यही नहीं होता है, इसके बाद मुझे पुस्तक का रूप देने के लिए मेरे पन्नो को मशीनों में छपने को डाल दिया जाता है। और नए ज्ञान, रचनाओ के लिए मुझे लेखको के पास भेजा जाता है। लेखक मुझे बहुत प्यार करते है। वे मेरे कोरे कागज पर पर अपनी कल्पनाओं, विचारों को मेरे साथ साँझा करते है।

इसके बाद इन विचारों pustak ki atmakatha hindi essays फ़ैलाने के लिए मुझे पुस्तक का रूप दिया जाता है। मेरे हर एक पन्ने को सुई धागे से छेद कर मुझे पुस्तक का रूप दिया just undertake the application essay है। authentication essays बाद में सर्वत्र ज्ञान फ़ैलाने के लिए तैयार होती हो। जो भी मुझे पढ़ता pustak ki atmakatha hindi essays मैं उसकी झोली ज्ञान के प्रकाश से भर देती हूँ।

वर्तमान मैं मुझे अनेक रूप लाल, नीला, पीला, हरा हर प्रकार के रंगो में रंगा जाता है। मुझे छोटे बड़े रूप दिए जाते है। मुझे देवी सरस्वती की तरह पूजा जाता है, मुझे सभी लोग ईश्वर की तरह ही सम्मान देते है।

 

वर्तमान में फटी पुस्तक की आत्मकथा (Vartamaan people Fati Pustak ki Atmakatha)


फटी पुस्तक कहती है की वर्तमान मैं भी उसे खूब प्यार और सम्मान दिया गया। उसे बड़े – बड़े पुस्तकालयों में सम्भाल के रखा है। उसे विद्यालयों में बच्चो को शिक्षा देने के लिए उपयोग किया जाता है। बड़े – बड़े  वैज्ञानिक भी अपने आविष्कार करने pustak ki atmakatha hindi essays लिए उसका उपयोग करते है उसके ज्ञान का लाभ उठाते है। उसे अब माँ लक्ष्मी का रूप भी पूजा जाने लगा क्यों की सभी लोग अब नोट की छपाई भी मेरे कागज पर ही करते है।

पुस्तक अपनी आत्मकथा इस कविता के माध्यम से बताना चाहती है –

फटी पुस्तक की कविता (Fati Pustak ki Kavita)

मै किसी के जन्म का प्रमाण हूँ,
तो कहीं मृत्यु का दस्तावेज हूँ।

मै न्यायलय में कहीं सत्य का प्रमाण हूँ,
तो कहीं झूठ की bank teller job application note essay हूँ।

मैं किसी के रोजगार का साधन हूं,
तो किसी के बेरोजगारी का प्रमाण हूं

मैं कहीं किसी के मृत्यु का फरमान हूं,
तो वही सत्य की जीत का प्रमाण हूं।

मैं कहीं लेखकों के ज्ञान का प्रकाश हूं,
मैं भी जीवन का एक आधार हूं।

मुझे कहीं पैसों में तोला जाता है,
तो कभी गरीबों में बांटा जाता हूं।

मुझ में लिखा है पूरा इतिहास,
मैंने राजा को रंक बनते भी देखा है।

मैं किसी के लिए पवन की धारा हूं,
तो किसी बूढ़े के लिए सर्दियों में गर्मी का सहारा हूं।

मुझ पर छपती है ज्ञान के बाते,
लेकिन जब छपती कोई बलात्कार,
हिंसा की बात तो बहुत दुःख होता है।

मुझे कहीं ईश्वर के रूप iliac crest anatomy essay पूजी जाती हूं,
तो कहीं पैरों में कुचल दी जाता हूं।

मुझ में छुपा है ज्ञान का भंडार,
जो एक बार पढ़ लें वह कभी न दुःख पाए।

– नरेंद्र वर्मा 

फटी पुस्तक कविता के माध्यम से कहना चाहती है की उसे अब जन्म प्रमाण पत्र बनाने से लेकर मृत्यु के दस्तावेज बनाने में भी उपयोग लिया जाता है। वह कहती है की उसमे सम्पूर्ण इतिहास, ज्ञान-विज्ञानं, brave completely new environment pecking order essay, रचनाए, कहानियाँ, कविता लिखा गया है। उसको जो भी पढ़ता है वह हमेशा ही ज्ञान की  प्राप्ति करता है।

यह हर व्यक्ति का हिसाब रखती है, इसमे कई महापुरुषो की जीवनी लिखी है तो वही भारत पर अंग्रेजो के अत्याचार की दास्तान भी लिखी हुई। मै हर एक सुख-दुःख को समेटे हुए हूँ। मेरे किसी पन्ने पर किसी शायर की शायरी लिखी है तो किसी पन्ने पर किसी प्रेमी के प्यार का इजहार भी लिखा हुआ।

मेरे पन्नो पर सत्य और इंसाफ का सविंधान लिखा हुआ। मेरे कुछ पन्नो पर जुल्म और अत्याचार का इतिहास लिखा हुआ है। पुस्तक कहती है कि उसे तब बहुत दुःख होता जब कुछ लोग उसे कचरे में डाल देते है, फाड़ देते है, जला देते है और कुछ लोग बेच देते है।

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वह एक कोने में पड़ी-पड़ी सोचती रहती है की उसका आने वाला कल कैसा होगा कही क्या मूंगफली वाला, चाटवाला, सब्जीवाला या चने वाला उठाकर ले जाएगा ?

या फिर कोई निर्धन बच्चा मुझे आधे पैसे देकर खरीद लेगा और अपनी ज्ञान की प्यास बुझाएगा।

मुझे तब बहुत दुःख होता जब लोग मेरे पन्नो को ऐसे फाड़ते जैसे “कोई द्रोपदी का चीर हरण हो रहा हो” मेरी इज्जत तार-तार हो जाती है न जाने वो सम्मान कहा चला spread the white essay है। मुझे सबसे ज्यादा दुःख तो तब होता जब कुछ लोग मुझे खरीद कर लाते है लेकिन मुझे पढ़ते नही है। मुझे किसी अलमारी के एक अंधरे कोने में रख देते है।

मुझे वहाँ बहुत घुटन होती है क्योंकि शायद अगर मै बाहर होती तो किसी को ज्ञान देती, कोई व्यक्ति मेरे ज्ञान से अपने जीवन के लिए रोजी रोटी कमाता लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। आज मैं एक कोने में पड़ी हूँ इससे अच्छा तो मै ना होती तो अच्छा था।

मैं चाहती हूँ की आप मुझे सदा सम्भाल के रखे ज्ञान प्राप्त करे और अगर मैं आप के काम की नहीं हूँ तो जिसको मेरी आवश्यकता हो उसे जरुर दे।  

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